अंतू बर्वा

रत्नागिरी की उस बीच वाली बस्ती में कई असाधारण सत्पुरुष रहते हैं. इन लोगों की रचना के लिए भगवानने कोई निरालीही मिट्टी इस्तेमाल की होगी. उनमें रत्नागिरीकी लाल पत्थरों के, नारियल-कटहलों के, खुजलीवाली अरवी की और टूटते ही जान गले में ला देने वाली गीली सुपारी के गुणों को एकत्रित किया होगा. रत्नागिरी की मिट्टी में ही ये शैतान छुपे हैं या इसके पानी में ही प्राणवायु और प्राणवायुके साथ दूजा कोई वायु मिलाया हे ये तो बस वही रत्नान्ग्रीका विश्वेश्वरही जाने.

अंतू बर्वा इसी मिट्टी में उपजा और बढ़ा. वैसे अंतूको सिर्फ अंतू के नाम से जाना जाये ऐसी उनकी उम्र नहीं. मैंने जब बारह तेरह साल पहले उन्हें पहली बार देखा तभी उनके दाढ़ी और छाती के बाल पकने लगे थे. दातों का काफी हद तक अण्णू गोगटे हो गया था. अण्णू गोगटे होना याने ‘गिर’ जाना यह अंतूजी द्वारा बहाल नया वाक्प्रचार है. रत्नान्ग्रीके अण्णू गोगटे वकील लगातार कई बरस मुन्शिपाल्टीके चुनाव में हारते रहे याने गिर गए. तबसे कुएंमें बाल्टी भी गिर जाये तो अन्तूजी पूछते हैं, “अण्णू हो गया क्या?”.

आमनेसामने तो कोई अन्तूजी को अंतू नहीं कहता. मगर उनका जिक्र सहसा तू-तडाके से याने एकवचन में ही होता है. बाकायदा सारे कोकणवासी होते ही हैं एकवचनी. मगर अंतूजी का संबोधन ‘अंतूसेठ’ है. इस ब्राह्मण को ये वैश्यॊंवाली उपाधी बहुत पहले से चिपकी है. अन्तूजी के हाथों पाप ही कुछ ऐसा हुआ था. पहले विश्वयुद्धके दौरान बंदरगाह पर उन्होंने कोई दुकान लगायी जिसके तो कब के बारह बज गए. मगर ‘अंतूसेठ’ कहलवाने के लिए इतना बहाना काफी था. उसके बाद अन्तूजी को निर्वाह के लिये किसीने भी कभी हाथ पैर चलाते नहीं देखा. कहीं पर दो वक़्त की रोटी का इन्तेजाम है. थोड़ी ज़मीन है. पांच पच्चीस नारियल के, दस पंद्रह सुपारी के और कुछ फूलों के वगेरा पेड़ हैं. दो तीन हापूस आम के हैं. कहीं कटहल, कहीं इमली खड़ी है. पुरखों के मकान में उनके हिस्से एक कमरा और बरामदा निकलता है. बावड़ी से पानी निकालने का अधिकार है. और इन सब के सहारे अंतूसेठ खड़े हैं.

हमारी प्रथम भेंट बापू हेगिष्टे के दुकान पर हुई थी. मैं सिगरेट लेने गया था और ‘केसरी’ अखबार के पीछे से जस्ते की ऐनक को आधा माथेपर सरका अंतूसेठ ने अचानक सवाल किया, “वकील साहब के जंवाई हो ना?”

“हाँ”.

“मैं तो देखते ही पहचान गया! अजी बैठिये! बापू, कँवरसाब के लिए चाय मंगवाओ.”

मैं तो समझ ही नहीं पाया के अचानक इंतनी आत्मीयता से मिलने वाले ये बूढ़े सज्जन हैं कौन. फिर अंतूसेठ ने खुद ही खुलासा किया. “आपके ससुरजी दोस्त हैं हमारे. उनसे कहियेगा के अंतू बर्वाने याद किया है.”

“ठीक है !”

“पूना से कब आये?”

“परसों ही आया हूँ.”

“क्यों नहीं. पहली बार दिवाली पर आये हो. एक अच्छी कार मांग लो! क्यों?”

“आपके मित्र हैं. आप ही कह दीजिये.”

“वाह! पुनाके निवासी हैं आप. बातचीत में भला हम आपसे क्या जीतेंगे! तो कुछ दिन रहने का इरादा है या सिर्फ फ्लाईंग विजीट?”

“बस दो एक दिनों में लौट जाऊँगा !”

“बढ़िया! थोड़े में ही प्यार बना रहता हैं. उस कोने वाले कपोसकर वकील के जंवाई की तरह मत करना. छह महीने यहीं जम गए. आखिरकार कपोसकर वकीलने किसी दिन गोबर से आँगन साफ़ करवाया! ज्यादा दिन ठहर गए तो जंवाई दशम ग्रह कहलाता है. क्यों ?”

“सही फरमाया!”

“बापूसेठ, पहचाना के नहीं? वकील साहब के जंवाई हैं! अरे भाई, हम दोनों का काम वही देखते हैं!”

हेगिष्टेजी ने भी नमस्ते की.

“चाय लोगे?”

“जी नहीं, गर्मी बहुत है !” मैंने कहा.

“अरे, रत्नान्ग्रीमें तो गर्मी होगी ही. तबेले में सोना हो तो घोड़ेके मूत की बदबू से क्या परेशानी. क्यों?” उस आखिरी “क्यों” पर खास जोर दे कर अंतूसेठ बोले, “रत्नान्ग्रीमें ठंडी हवा बहती तो हमारे गाँव को सिमला ना कहते? आपके बरामदे में थोड़ी गर्मी ज्यादा है. किसी दिन भरी दोपहरी में निकल पड़ना अपनी सायकिल पर और आ जाना सीधे हमारी सुपारी की बाग़ में. सुपारी की बाग़ बोले तो बिलकुल एयर कंडीशन !” दिल खोल कर हंसते हुए अंतूसेठ बोले. और उपरसे “अरे कँवरसाब, हमारा ग्रामीण चुटकुला, क्यों” यह भी चिपका दिया. “बापूसेठ, लेखक हैं अपने जमाईराज. अपने आबा सेठ की तरह नाटक लिखते हैं. ज्यादा मत बोलना वरना आपही पर लिख देंगे कोई बढ़िया स्वांग !”

अन्तूसेठ भी मेरी किर्ती से परिचित हैं जानकर खिला मेरी ख़ुशी का गुब्बारा बापुसेठ हेगिष्टे के सवाल से फुस्स हो गया. मुझे ध्यान से निहारते हुए बापूसेठ बोले, “क्या काम करते हो?”

“आप भी क्या अनाड़ियों वाले सवाल करते हो? निकालिए वो रद्दी. दस जगह पर इनका नाम फोटो के साथ छपा है. फ़िल्में बनाते हैं.”

“क्या कह रहे हैं?” हेगिष्टजी ने ऐसी सूरत बनाई मानो कोई भूत देख लिया हो.

“कँवरसाब, एक बात पूंछू ?” उनके चेहरे पर एक शरारत भरे सवाल की झलक साफ नज़र आ रही थी.

“ज़रूर पूछिये —”

“एक फिल्म बनाओ तो आपको कितना मिल जाता है ?”

ये मेरी पहली कोकण यात्रा तो थी नहीं; इसलिए ऐसे सवालों मुझे आदत हो गयी थी.

“अब ये तो हर फिल्म का अलग हिसाब होता है.”

“मगर हमने तो सुना है कि लाख डेढ़ लाख मिल जाते हैं — ”

“इतना मुनाफा मराठी फिल्म से ?”

“चलिए! लाखों न सही, हजारों तो मिल ही जाते होंगे … ”

“मिल जाते हैं… पर कभी डूब भी जाते हैं !”

“अरे ये तो लगा रहता है! अब धंदा करने बैठे हैं तो नफा भी होगा और नुकसान भी. और एक बात पूंछू? … याने आप अगर नाराज़ ना हो तो … ”

“नहीं नहीं, ऐसी क्या बात हैं?”

“ये फिल्मों की नटनीयों के बारे में हमने जो सूना है वोह सब सच है या हमारे बेलगाँववाले गंगाधर बाष्टे के खालिस मख्खन की तरह आटा मिश्रित ?”

“ये मतलब?” मैं जान कर अंजान बन गया.

“चालाक हो कँवरसाब ! कोर्टमें गवाही अच्छी दोगे! अरे, ये जो सब मतलब तर्जनीनासिकान्याय वाला मामला …”

ये तर्जनीनासिकान्याय मेरी समझ में नहीं आया. तब अंतूसेठने अपनी तर्जनी नथुनों पर लगा कर साभिनय दिखलाया. इतने में हेगिष्टजी की मंगवाई चाय आ गयी. “लीजिये” अंतूसेठने मेरे हाथों में चाय थमाई और उस चायवाले लड़के को “गूडबक, रत्नान्ग्रीकी सारी भैसें पेट से हैं क्या रे?” सुनाया और जाते जाते चाय के रंग पर अपनी दो टुक राय झाड दी. फिर चाय को तश्तरी में उंडेलकर फुर फुर फूंकने लगे. दरअसल उस छोरे को चाय में दूध कम है यह बात सीधे सीधे भी कही जा सकती थी. लेकिन टेढ़ी बात करना ना सिर्फ अन्तूसेठ बल्कि उस पूरी बस्ती का स्वभाव था.

अंतूसेठ और मेरा परिचय अब पुराना हो चला है. पिछले दसबारा सालों में मैं जितनी बार रत्नागिरी गया हर बार उनसे मिला. उन्होंने मुझे अपने अड्डे में शामिलभी कर लिया. एकदोबार ताश सिखाने की भी कोशिश की. फिर छटे दशक की ओर अग्रसर उन बूढों के जमावड़े में अंतूसेठ और उनके साथियों से उनका अनूठा जीवनदर्शन भी खुब सूना. वहीँ पर उनकी खासमखास परिभाषाएं भी सीखीं. कंधे पर गमछा, कमर में धोती, पैरों में चरमराती चप्पलें, एक हात में डंडा और दूजे में कटहल लिए, “अरे गोविंदभट, जमाओगे क्या दो-दो हाथ?” या फिर “परांजपे, सचेत हो या बन गया आपका अजगर?” ऐसी आवाजें दे दे कर ताश के साथी जमा करने निकली टोली के साथ मैं भी खूब घुमा हूँ. अगर बाज़ी ना जमे तो पत्ते फ़ेंककर, “कँवरसाब, छेड़ दो बढ़िया मालकंस. गोडबोले पीटो थोडा तबला, खातूसेठ, निकालो आपका बाजा.” जब ऐसी फर्माईश हो तो मैं भी अपना गला साफ़ कर लेता. “दम है भई नरेटी (सांस की नली) में!” ऐसी तारीफ सिर्फ यहाँ मिलती थी.

साल-दो-साल में रत्नागिरी का एकाध चक्कर लग जाता था. हर बार किसी मेंबरके गुजरने की खबर मिल जाती.

“अंतूसेठ, दामुकाका नज़र नहीं आये !”

“कौन? दामू नेने? मजे में हैं! कहते हैं ऊपर रंभा उनके गंजे सर पर तेल थपथपा रही है और उर्वशी पंखा झल रही है.”

“मतलब?”

“अजी मतलब का डालो अचार! दामू नेने की तो रत्नागिरी से हो गयी रवानगी!” ये कहकर अंतूसेठने आसमान की तरफ इशारा किया.

“अरे रे! मुझे पता नहीं था.”

“पता होगा भी कैसे? दामू नेने लुढ़क गए ये खबर रेडियो पर तो प्रसारित नहीं होगी? अखबार मैं मृत्युलेख छपवाया था. लिख दिया की प्यारे, मिलनसार और धार्मिक थे! छापनेवालो का क्या, जो कहो छाप देंगे. दामू नेने और प्यारा? चिता पर आड़े हो गए पर सर से शिकन नहीं उतरी ! किसी दिन रात में गर्मी हुयी सो बरामदे में लेटे. तो सुबह वहीँ खेल ख़तम! आदमी सच्चा धार्मिक. पिछले बरस देवशयनी एकादशी के दिन परलोक सिधारे. दो पाल्खियाँ निकली उस आषाढ़ के दिन — एक में विठोबा दूसरे में दामू. आषाढ़ में वो गए और दशहरे के दिन हमारे दत्तु परांजपे ने सीमा पार की. जीवन सफल हो गया. पहला गया, दूजा गया अब तीजे की राह देख रहें हैं!” शरारतसे कंधा मटकाते हुए अंतूसेठ बोले.

पांच फूट के आसपास ऊँचाई, गुलाबी गोरा रंग, मूंहपर पतले तीलके दाग, बिल्ली जैसी भूरी निमिष आँखें, उम्र के साथ बढती झुर्रियां, सिरपर तेलसे कोने भीगी हुई टोपी, ऊपर कोट, कमर में घुटनों तक आती धोती, पैरों में कोंकणी चप्पलें, दातों की आधी कतार उठ चुकी है, इसलिए रिक्त मसूड़ों को ज़ुबान लगाकर बात करने की लत और इस सारे साजों सामान के साथ पैंतालिस-पचास किलो वजन. बुढ़ापे में जीर्ण होते शरीर में तब भी एक बात बिलकुल ताज़ा और वो है सानुनासिक लेकिन सुस्पष्ट ध्वनि और माथेपर पीढ़ी दर पीढ़ी थाप-थाप कर लगाये नारियल के तेलकी बदौलत पुश्तैनी तीक्ष्ण बुद्धि! अंतूसेठही नहीं, उस गली में बसे उस उम्र के सारे नमूने थोड़ेबहुत फर्क से एक ही ढंग के या तो कहो बेढंगे. बिनविषैले सांप की तरह पैरोंको घेरकर काटने वाली जुबान. किसीकी खुशीमें ना तो कोई सुख और ना ही किसी के ग़म का अफ़सोस. ना जीने की ख़ुशी ना मरने का ग़म. ना गाने बजाने का शौक और ना उससे घिन. खाते समय भी चटखारा लेने की बजाय सिर्फ पेट पूजा से वास्ता! जिंदगी की गाडी तेल होने से ना कभी तेज़ दौड़ी और ना उसके अभाव में कभी चरमराई. मगर चाल हमेशा कोंकण की राहों की तरह टेढ़ीमेढ़ी. किस्मत में अश्वत्थामाकी तरह आटे से बने दूध की प्याली! उसके घर दूध का आटा बना. यहाँ प्रभुकृपा से नारियल के रूप में कल्पवृक्ष तो है मगर उसमे भी गिरी की ज़गह उसके खोल से अधिक आत्मीयता!

गर्मी के दिनों में बम्बई से कोई औसत दर्जे की नाटक कंपनी किसी तंबूवाले थेटर में ‘एकच प्याला’ का खेल दिखा रही थी. कलाकार तो बस ऐंही थे. पहला अंक ख़त्म हुआ, बाहर सोडा बोतल की ची-ची शुरू हो गयी. किटसन के बड़े बड़े कंदीलों के उजाले में अंतूसेठ की मूर्ति नज़र आयी. एक ऐरेगैरे मेनेजर के साथ अंतूसेठ बतियाने लगे.

“भीड़ कैसी है?”

“बस ठीकठाक!”

“प्लान तो खाली पड़ा है. चलो आधे दाम में छोड़ दो!”

“छि! छि!!

“अरे, छि छि करके छिपकली की तरह झटक क्या रहे हो? मैंने यहीं से शुरू का हिस्सा सुन लिया है. दम नहीं है इस सिन्धु में. ‘लागे हुरहुर’ इतना कर्कश गया के सुर ढूँढने पड़ोस के गाँव जाना पड़े. कभी बालगंधर्वजी को सुना था क्या?” हमेशा की तरह आखिरी ‘क्या’ को उछालते हुए अंतूसेठ ने फर्माया.

मेनेजर भी आग बबूला हो गए. “हमारी तरफ से ज़बरदस्ती नहीं है के आप नाटक देखें.”

“सारे गाँव को तो न्योता दे रखा है. जगह ज़गह बोर्ड टांग रखे हैं — और घर घर जाकर बैंड बजाके किसे बुलावा दिया है आपने! और वैसेभी खाली कुर्सियों को नाटक दिखा रहे हो – चलो चार आने में बात पक्की, निकालो टिकट.”

“चार आने में तो नट-नटनी भी खेला नहीं दिखाते?”

“वो भले! पहले तमाशा दिखाते हैं और फिर टोपी घुमाते हैं. यूं कीजिये, अगला गाना ‘कशि या त्यजूं’ बढ़िया पेश किया तो आपकी थाली में चार आने और डाल दूंगा.” आसपास के लोग तो हंस पड़े मगर मेनेजर बिगड़ गए. तभी अंतूसेठ की नज़र मुझपर पड़ी. “नमस्ते कँवरसाब …”

“नमस्ते !”

“क्यों कैसा चल रहा है ‘एकच प्याला’?”

“ठीक है!”

“मुफ्त पास में देख रहे हो क्या? बाकी आप भी सब एक जैसे ही. कहते हैं एक नाईं दुसरे से कभी दाढ़ी बनाने के दाम नहीं लेता.”

“नहीं जी. ये देखिये टिकट है मेरे पास”.

“पैसा फेंक के तमाशा देखा है तो ये ‘ठीक है’ का आलाप क्यों लगा रहे हो? और वो सिन्धुका पार्टी तो मुझे बिलकुल बकवास लग रहा है.”

“अजी सिन्धुका पार्टी क्यों कह रहे हैं? वो तो अभिनेत्री हैं.”

“क्या कह रहें हैं आप? रूप माशाल्ला और आवाज़ सुभानल्ला ? अगर ठान लिया तो सुधाकरको गोद में लेके घुमा सकती है. सिन्धु कैसी? उसे तो सिन्धुदुर्ग का किला कहना चाहिए.”

“लगता है आपने भी देखा है नाटक?”

“ऐंवें ही. थोड़ी देर अन्दर झांक लिया बस ….. छ्यः ! इससे तो रामलीला भली.”

बिना मांगे अपनी राय थूंक कर अंतूसेठ चले गए. वैसे भी उनका जीवन दिनरात ‘थूंक’ने में ही बीता था. इतने सालों से हमारा परिचय है, लेकिन उनकी पारिवारिक दशा के बारे में मुझे कुछ नहीं मालूम. एकबार उन्हीं के मित्र अण्णा सानेसे थोड़ी बहुत जानकारी मिली. एक दिन बातों बातों में अंतूसेठके बेटे का जिक्र चला.

“अच्छा? एक बेटा भी है अंतूसेठको?”

“है? क्या कह रहें है? अच्छा खासा कलेक्टर है!”

“कलेक्टर?”

“बम्बई में स्टेशन पर टिकट जमा करता है.” चेहरे पर शिकन लाये बिना अण्णाने फ़रमाया.

“तो क्या अपने पिता की कोई मदद नहीं करता?”

“जी, कर देता है कभी कभी. उसे भी तो अपना घर चलाना है. और फिर बीबीसीआय के इंजिन में जीआयपी का डिब्बा जो लगा है …”

उस अड्डेके सारे खास शब्दों को जमा करें तो एक नया कोष छपवाना पड़े. बी बी सी आय को जी आय पी जोड़ना मतलब जात बाहर शादी करना ये समझने में मुझे थोडा समय लगा.

“आई ना बात समझ में? इस वजह से अंतूसेठ की पूजापाठ में थोडा खलल पड़ जाता है. सुना है बेटेके घर कुछ और भी नितनेम, पीना पिलाना वगेरा, चलता हैं. इस पचड़े में अंतूसेठ अपना काम चलायें भी तो कैसे? एकबार कहासुनी माफ़ कर पोते का मूंह देखने गए थे. ऐसे लौटे मानो खेल खत्म. हर होली दिवाली बेटा मनिआर्डर के रूप में पितृप्रेमकी बक्षीश भेज देता है! पांच दस रुपये की! कुछ दिन किराये की हवा से सीना तान कर चलते हैं. और अगले चार पांच दिन जेब में हाथ डालकर खुले सिक्कों की छनछन सबको सुनाते फिरते हैं.”

“अब टिकट कलेक्टर की तनखा भी कितनी होगी?”

“तनखा तो सिमित ही है, पर सुनने में आया है की थोड़ी ऊपर की कमाई भी हो जाती है. सच झूट तो राम जाने. मगर चलता है! खाता है तो खाने दो …. क्यों? अजी आठ आने की अफरातफ़र की तो आढीतिरछी रेखांओ का ताज पहना कर रत्नागिरी की डिस्ट्रीक्ट जेल भेज देते है और लाख दो लाख का घोटाला किया
तो गाँधी टोपी पहनाकर पहुंचा देते हैं अस्सॆंब्ली! लोकनियुक्त प्रतिनिधि!”

राजनीती तो उस अड्डे पर सभीका पसंदीदा विषय था! हर नेता और विचारधारा पर मौलिक विचारों का अखाडा! कोकण में सुखा पड़ा था. वैसे तो ये हमेशा से ही सूखाग्रस्त इलाका है पर अन्तूसेठकी भाषा में ये ‘फ्यामिन एक्ट’ द्वारा पारित सुखा था! सूखे वाले क्षेत्रों से नेहरूजी का दौरा चला रहा था. गाँव में चहलपहल थी. शाम को किसीने अंतूसेठसे पूछा, “क्या अन्तुसेठ? सभा में नज़र नहीं आये?” “किसकी न्हेरुकी? छोडो! अरे यहाँ सुखा पड़ा है … भाषण क्या दे रहो हो! चावल दो! ये तो चारणों की खाड़ी में डूबते हुए मुसल्ले को विश्वेश्वरके घाट पर खड़े होकर कुरान पढ़ाने वाली बात हुई. वो वहां खड़ा चिल्ला रहा है और ये यहाँ … न उसे इससे कोई फायदा न इससे उसको! सारे गुडबक. आया न्हेरु चले देखने! और दिखाया भी क्या? बाल गंगाधर तिलक जहाँ पैदा हुए वो कमरा और खाट? गंगाधरपंत तिलक को क्या भगवानने सपने में दर्शन देकर बताया था के सुनो … आपकी पत्नी लोकमान्य को जनने वाली है? दिखा दिया किसीका पलंग और कह दिया के बस यहीं पहली बार तिलक ने टयां किया था! है कोई सबूत? या तिलककी दाई आई थी गवाही देने? तिलक की बात छोडो! सौ बरस पहले की बात है. आपकी माताजी बता सकती है की आप किस कमरे में पैदा हुए थे? पहले घर जाकर अपनी बुढ़िया से पूछो और फिर करना ये न्हेरु और तिलक की बातें.”

मैं ये कभी जान नहीं पाया के ये लोग किसे अपने आदर के योग्य समझते हैं? गाँवमें अगर कोई पंडित आ जाये तो ‘पढिक’ कहके उसका मज़ाक उडाओ. “अगर बाज़ार से दो पैसे का नींबू मंगवाया तो सीधे लायब्ररी जायेगा खरीदने!” किसीका बेटा प्रोफ़ेसर बन गया. ये सुनकर अंतूसेठ झटसे बोले, “सर्कस में शामिल हो गया क्या? पहले कोई छत्रे प्रोफ़ेसर थे.” किसीने नई दुकान खोली तो ‘दिवालिये का दाखिला मंगवालो अभीसे!” ये आशीर्वाद.

भगवान जाने किस दर्शन का काढ़ा पीकर ये लोग जीते हैं. आधे से ज्यादा लोग मनीऑर्डरके सहारे गुजर बसर करते हैं और उसमें से पैसे बचाकर अदालत में मामले दर्ज कराते हैं. बाद में कोर्ट के चक्कर काटते रहते हैं. विशाल सागरतीर है, नारियल के बाग़ है, सुपारी के बागान है, सब कुछ है: पर ऐसी उदात्तता पर जब घोर गरीबी का हमला हो तो लड़ने के लिए शेष बचता है बस दर्दनाक हास्य का एक अभेद्य कवच!

किसी दिन गांधीजी का जिक्र हुआ. अंतूसेठने अपनी विशेष टिपण्णी शुरू की. “अजी, कौन गाँधी और किसका गाँधी? दुनिया घूमा, पर रत्नान्ग्री नज़र नहीं आया. कच्चा खिलाडी नहीं था! उसे अच्छी तरह से मालूम — यहाँ न तो उसकी धोती की तारीफ होगी और ना डंडे की. हम सारे धोतीवाले और उससे से भी ज्यादा नंगे! और सूत वाली बात में भी कई दम नहीं! हमारा शंभूसेठ सारी ज़िन्दगी जनेऊ का सूत कातता रहा! ब्रिटिश सरकार तो छोडो रत्नान्ग्रीका गिलिगन कलेक्टरतक डरा नहीं! तीसरा अस्त्र उपवासका! यहाँ आधा कोकण भूखा! खा पी कर मोटा हो जाये वही भूखे को आदर की नज़रों से देखता है. हमें क्या? नहीं, इन्सान महान होगा … पर उनके बड़प्पन को हम जमा करें भी तो किस खाते में? और स्वतंत्रता की बात करो तो उसका संबंध न तो गाँधी से हे, न तिलक से और ना ही सावरकर से.”

“तो क्या आज़ादी आसमान से टपकी?”

“कहाँ से टपकी इसकी खोज खबर आप लीजिये! सच पुछो तो अंग्रेज़ तो गए ऊब. धंदा तो मंदा चल ही रहा था … पीट दिया दिवाला! सब लूट खसोट लिया, और आप को छोड़ गए गरीबी में लोटने! समय का पहिया तो घूमता रहता है. सत्ता ना अंग्रेज़ की, ना न्हेरु की और ना ही जनता की. सत्ता तो सिर्फ उस विश्वेश्वर की!”

“तो फिर आपके विश्वेश्वर अंग्रेजों के नियंत्रण में कैसे पहुंचे ?”

“पगला गए हो क्या? विश्वेश्वर दृढ है अपनी जगह! अजी, एक खेला दिखा दिया आपको.!

“डेढ़सौ बरस की गुलामी का ये कैसा खेल?”

“अरे डेढ़सौ बरस आप के लिए! ब्रह्माजी की घडी में तो हज़ार साल बाद भी सुई एक सेकंड से आगे नहीं बढ़ती!”

कोकण की उस बीच वाली गली के बरामदेपर, लालटेन की रोशनी में पास के पौधों की हिलती डुलती काली छाया में, जब उस थके हारे मूंह से ये जीवन दर्शन सुनाई दे तो दिल दहल जाता है. “जी, ये समाजवाद की सब बातें हैं बस बातें! एक आम का पत्ता तक दुसरे जैसा नहीं होता. ब्रह्माजीके दरबार में सबके हिस्से अलग बर्तन आता है. फिर सबकी किस्मत एक जैसी कैसे होगी? पल भर के लिए मान लिया की आ गया समाजवाद! वो हमारी रत्नान्ग्रीका पदरपंच जैसे अपनी सिटी बजा बजा के कहता है वैसे मानो आ गयी कोकण रेल और गयी हमारे भक्त पांडु के आँगन से —- तो क्या अंगरहित पांडुजी के कन्धों से हाथ फूट पड़ेंगे? और जब हाथ ना हो तो जिसकी लाठी उसकी भैंस के ज़माने मैं बिना हाथों वाला पांडु दूध दोहना भी चाहे तो दुहेगा कैसे? वो जैसा है वैसा ही रहेगा! आज़ादी मिलने से भैंगे हरी साठे की ना तो आँख सीधे होंगी और ना ही महादेव गडबोलेकी तोंद अन्दर जाएगी! समाज में तो उन्नीस-बीस हमेशा ही रहेगा! अरे, रामराज्य में भी श्रीरामचंद्र ने हनुमानजी की पूंछ निकालकर अपनी पीठ पर नहीं लगाई थी — वें नर ही बने रहें और वो वानर.”

ऐसे समय लगता है जैसे अंतूसेठ की जिव्हा पर सरस्वती का वास हो.

“सही कहा आपने!”

“सिर्फ गर्दन हिलाकर हाँ हाँ मत कीजिये उस शामराव मुरकुटे की तरह! कुछ गलत कहा तो कान खिंच लीजिये! आप उम्र में मुझसे छोटे हैं पर शिक्षा से तो बड़े है ना.”

अंतूसेठकी इन बातों में कोरा व्यंग्य नहीं होता. उनके सीने में एक जलन से होती है. इन पिछले चारपांच सालों में रत्नागिरी का कोई चक्कर नहीं लगा. अब वहां बिजली लग गयी, कॉलेज बन गया, पक्की सड़क आ गई. मैं दोतीन साल पहले जब गया तो अंतूसेठ से कहा,

“अंतूसेठ, आपकी रत्नागिरी तो खिल गई! बिजली के दिये जल पड़े. अपने घर लगवाई या नहीं आपने बिजली ?”

“छोडिये ना, अँधेरा का बसेरा ही ठीक है! कल को अगर उजाला हो भी गया तो क्या देखना पड़ा है? अंदाधुंद गरीबी ही ना? रंग उतरी दीवारें और टूटी छत देखने के लिए बिजली की क्या ज़रुरत? हमारी कंगालीको अँधेरेमें छिपाना ही ठीक!”

जी खोल कर हंस पड़े अंतूसेठ. इस बार दाँतों का लगभग पूरा अण्णू गोगटे हो गया था. फिर ये भी पता चला के अड्डे के एक दो संगी साथी ‘निजधाम’ को लौट गए. अंतूसेठ की बातों में पहले कभी न देखी ऐसी करुणा और मिठास नज़र आई. परिचितों का अभाव उन्हें खलने लगा था. “जोगलेकर का बेटा तरक्की कर दिल्ली चला गया.” खुद होकर अंतूसेठ ने बात चलाई. “अपने बाप को काशीविश्वेश्वर, हरिद्वार-हृषिकेश सब दर्शन करा दिये. शंभू जोगलेकर तो गंगा नहा लिए! मेरे लिए गंगाजी का पानी एक छोटीसी लुटिया में सिलबंद करके याद से ले आये ! कँवरसाब, अगली बार आओगे तो वही सिल तोड़ कर लुटिया मेरे मूंह में उलटी पड़ी देखोगे.” हमारी पहली मुलाक़ात वाला संबोधन अब भी कायम था. उस के बाद फिर पिछले साल एक बार फिर रत्नागिरी जानेका मौका मिला. सौभाग्य से गंगाजल वाली लुटिया अंतूसेठ के घर में अब भी सिलबंद थी.

“वाह वाह! कँवरसाब कांग्रेचूलेशन! हमें पता चला. ज़रूर हो आइये. एक रिक्वेष्ट है भाई. अब तो अंग्रेजी में बात करनी पड़ेगी आपसे.”

“क्या रिक्वेस्ट है?”

“बस वो कोहिनूर हिरा ज़रूर देख लेना. इतनी एक ख्वाहिश दिल में ही रह गयी! अगर कौवा पिंड छूने से इंकार कर दे तो एक बार जोर से कोहिनूर कोहिनूर चिल्लाना. छू लेगा! वापसी पर बताना कैसा दिखता है. लन्दन, प्यारिस सब देख लेना.” बस यूँही मन हुआ उनके पाँव छुं लू. मैंने वहीँ सड़क किनारे झुक कर प्रणाम किया. “जीतो रहो! आस्था है, इसीलिए सफलता आपके कदम चूमती है.”

इजाज़त लेकर अभी चार कदम ही बढ़ा था के उन्होंने फिर आवाज़ लगाई.

“कँवर साब — !”

“क्या अंतूसेठ?”

“जा तो रहे हो मगर अकेले या अर्धांगिनी के साथ?”

“जी हम दोनों ही साथ जा रहे है.”

“बहुत अच्छा! यूँही मन में ख्याल आया. सोचा ऊंची शिक्षा लेने परदेस जा रहे हो — कच देवयानी की कहानी याद आ गयी. क्या? हमारे बेटी को भी आशीर्वाद देना! याद रहे आपका सौभाग्य उसकी देन है. आपको बता रहा हूँ. मन में ही रखिये. किसीसे ना कहना. चालीस साल पहले हमारी वो चल बसीं. आजतक देहली का आम नहीं खिला. किसी ज़माने में सैंकड़ो हापूस उतारे थे. पर देखिये किस्मत किस रास्ते से निकल जाती है. छोडो. खैरियत से लौटना. प्रस्थान कब?”

“कल सवेरे सरकारी बस से निकल पड़ेंगे!”

“यहाँ से सीधे बम्बई जा रहे हो?”

“हाँ.”

“यही ठीक है! अगर ये यात्रा सफल रही तो उसके सहारे इंसान पृथ्वी प्रदक्षिणा भी कर ले. उपरवाली गली के तात्या जोग परसों ही लौटे — हिसाब लगा रहें हैं अपनी हड्डियों का. कह रहे थे की छ आठ बस में ही छुट गयी.” मूंह खोल के अंतूसेठ हंस पड़े. अब बस एक दांत मूंह में चमक रहा था.

तडके पांच बजे बस अड्डे पर अंतूसेठ ने अपनी हट्टीकट्टी आवाज़ में हेला लगाया “कँवर साब”. मैं चौंक गया. अंतूसेठने बैदजी की पुडिया की तरह एक पुडिया मेरे हाथों में रख दी.

“मुझे मालूम है की आप इन बातों पर यकीन नहीं करते. लेकिन इसे आपकी जेब में रहने दीजिये. विश्वेश्वरकी बभुती है. वकील साहब ने बताया हवाई यात्रा है. इसका बोझ ना होगा आपकी जेब का.”

बस चल पड़ी और अंतूसेठने हमारे परिवारके सदस्योंके साथ कुर्ता ऊपर कर अपनी बूढी निमिष आँखें पोंछी. उस धीमी रोशनी में भी नज़र आती उनकी पसलियाँ मेरी आँखों में घर कर गयीं. कोकणके कटहल की तरह वहां के लोग भी — खूब ना पकें तो मिठास नहीं आती उनमें.

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4 thoughts on “अंतू बर्वा

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